एक मौन प्रतिज्ञा: संघर्ष से समर्पण तक Love story

एक मौन प्रतिज्ञा: संघर्ष से समर्पण तक

दृश्य १:

लाइब्रेरी की वो खामोश मुलाकातें
शहर की उस पुरानी ‘सिटी लाइब्रेरी’ में धूल जमी किताबों के बीच आर्यन का दिन बीतता था। वह वहां केवल एक कर्मचारी नहीं था, बल्कि उन किताबों में अपना भविष्य ढूंढ रहा था। उसी लाइब्रेरी के कोने वाली मेज पर काव्या हर शाम आकर बैठती थी। खिड़की से आती धूप जब काव्या के चेहरे पर पड़ती, तो आर्यन अपनी फाइलें छोड़ बस उसे देखता रह जाता। काव्या का सादगी भरा पहनावा और पढ़ाई के प्रति उसकी एकाग्रता आर्यन को प्रभावित करती थी। कई महीनों तक उनके बीच सिर्फ औपचारिक ‘नमस्ते’ और किताबों के लेन-देन के अलावा कुछ न हुआ। आर्यन जानता था कि वह एक फटे हुए थैले में अपनी दुनिया समेटे हुए है, जबकि काव्या के बाहर एक महंगी गाड़ी उसका इंतज़ार करती थी।
दृश्य २:

बारिश और बदलती किस्मत
एक शाम आसमान काला पड़ गया और मूसलाधार बारिश होने लगी। लाइब्रेरी बंद होने का समय हो चुका था। काव्या परेशान होकर बाहर बरामदे में खड़ी थी। आर्यन अपना पुराना थैला कंधे पर लटकाए बाहर निकला। उसने देखा कि काव्या ठिठुर रही है। बिना कुछ सोचे, आर्यन ने अपनी पुरानी लेकिन साफ छतरी उसकी ओर बढ़ा दी।
“आप कैसे जाएंगे?” काव्या ने पूछा।
आर्यन मुस्कुराया, “मुझे भीगने की आदत है, पर किताबों के शौकीनों को सर्दी जल्दी लग जाती है।”
उस छोटी सी बातचीत ने उनके बीच की बर्फ तोड़ दी। अगले दिन काव्या छतरी लौटाने आई, तो साथ में दो कप कॉफी भी लाई। उस दिन पहली बार साहित्य और सपनों पर घंटों चर्चा हुई।
दृश्य ३:

चुनौती और बिछड़ना
रिश्ता गहरा हुआ, तो चुनौतियों के पहाड़ भी सामने आए। काव्या के पिता, जो शहर के बड़े ठेकेदार थे, उन्हें जब आर्यन के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे अपने दफ्तर बुलाया। आर्यन वहां पहुंचा, तो काव्या के पिता ने एक चेक बुक सामने रख दी।
आर्यन ने विनम्रता से कहा, “सर, मुझे आपके पैसे नहीं, काव्या का साथ चाहिए।”
पिता ने तंज कसा, “प्यार से पेट नहीं भरता। अगर एक साल के भीतर तुम इस काबिल बन सको कि मेरी बेटी को वही जीवन दे सको जो मैंने दिया है, तो मैं सोचूंगा। वरना, काव्या की शादी अगले साल तय है।”
काव्या बाहर रो रही थी। आर्यन बाहर निकला, उसके आंसू पोंछे और सिर्फ इतना कहा, “मुझ पर भरोसा रखना। मैं खुद को काबिल बनाकर ही लौटूँगा।” उस रात आर्यन ने शहर छोड़ दिया।
दृश्य ४:

तपस्या का साल
अगला एक साल आर्यन के लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। दिल्ली की एक छोटी सी तंग कोठरी में, जहां ठीक से रोशनी भी नहीं आती थी, आर्यन ने खुद को किताबों में कैद कर लिया। न कोई त्यौहार, न कोई दोस्त, और न ही काव्या से कोई बात। उसने अपना फोन तक बंद कर दिया था ताकि उसकी आवाज़ सुनकर वह कमजोर न पड़ जाए। वह दिन में बिस्किट खाकर सो जाता और रात भर लैंप की रोशनी में ‘सिविल सेवा’ की तैयारी करता। दूसरी ओर, काव्या के पिता का कारोबार अचानक ढह गया। गलत निवेश के कारण उनकी संपत्ति बिक गई और वे एक छोटे घर में रहने चले गए। काव्या ने अपने पिता का सहारा बनने के लिए एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया।
दृश्य ५:

वापसी और मिलन
नतीजों का दिन आया। आर्यन ने न केवल परीक्षा पास की, बल्कि पूरे राज्य में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। वह अब एक ‘कलेक्टर’ बनने जा रहा था। वह सबसे पहले उसी पुराने शहर लौटा, लेकिन वहां काव्या का बंगला गायब था। वह पागलों की तरह उसे ढूंढने लगा। अंत में, शहर के बाहरी इलाके के एक छोटे से मकान में उसे काव्या दिखी, जो अपने बीमार पिता को दवा पिला रही थी।
आर्यन को दरवाजे पर देख काव्या के हाथ से दवा की शीशी गिर गई। वह फटे हाल में थी, थकी हुई थी, लेकिन उसकी आँखों में वही चमक थी।
आर्यन आगे बढ़ा और उसके पिता के पैर छुए। उसने अपना ‘अपॉइंटमेंट लेटर’ उनके हाथों में रखा और कहा, “सर, अब मैं काव्या का हाथ मांग सकता हूँ?” पिता की आँखों में पछतावे के आंसू थे।
दृश्य ६:

अंत – शहनाइयों की गूंज
महीने भर बाद, शहर के एक सादे लेकिन भव्य मंदिर में दोनों का विवाह संपन्न हुआ। कोई दिखावा नहीं था, बस अपनों का आशीर्वाद था। आर्यन अपनी सरकारी गाड़ी में नहीं, बल्कि उसी छतरी के नीचे काव्या को लेकर बाहर निकला जिसे उसने पहली बार दिया था। काव्या ने लाल जोड़े में आर्यन की ओर देखा और धीरे से कहा, “तुमने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।”
आर्यन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “और तुमने मेरा इंतज़ार करके उस प्रतिज्ञा को मुकम्मल बनाया।”
आज वे न केवल एक पति-पत्नी थे, बल्कि संघर्ष और जीत की एक ऐसी मिसाल थे, जिसे पूरा शहर सलाम कर रहा था

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