नैनीताल की बर्फीली वादियों से जब आशा मुंबई आई थी, तो उसके अरमानों की डोली बड़ी रंगीन थी। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर को वह अपना संसार समझ रही है, वहाँ की दीवारें बर्फीली वादियों से भी ज़्यादा ठंडी होंगी। उसके पति, संजय, ने शादी के तीन साल बीत जाने के बाद भी उसे कभी प्यार से नहीं देखा था।
संजय का व्यवहार आशा के लिए एक पहेली बन गया था। वह न तो गुस्सा करता, न ही बात करता। ऐसा लगता मानो आशा उसके लिए अदृश्य (Invisible) हो। वह ऑफिस से आता, चुपचाप खाना खाता और अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लेता। आशा को अक्सर रात के सन्नाटे में संजय के कमरे से किसी पुरानी धुन के बजने की आवाज़ आती।
आशा एक संस्कारी और ऊँची सोच वाले परिवार की बेटी थी। उसकी माँ ने सिखाया था कि रिश्ता निभाने के लिए पत्थर बनना पड़ता है। इसीलिए, संजय की बेरुखी के बावजूद, आशा ने घर नहीं छोड़ा। वह अपने सास-ससुर की सेवा में ऐसे जुट गई जैसे वही उसकी असली दुनिया हो। पर उसके मन में एक सवाल हमेशा चुभता— “संजय आखिर किस बात की सज़ा काट रहे हैं?”
एक दिन जब संजय ऑफिस में थे, सफाई करते वक्त आशा को अलमारी के पीछे एक पुराना बॉक्स मिला। उसमें कुछ पुरानी चिट्ठियां और एक फोटो थी। फोटो में संजय के साथ एक लड़की थी— ‘पायल’। संजय पायल से बेइंतहा प्यार करते थे, लेकिन पायल दूसरी जाति की थी। संजय के परिवार ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। समाज और परिवार के दबाव में पायल ने संजय का साथ छोड़ दिया और किसी और से शादी कर ली।
संजय को लगा कि पायल ने उसे धोखा दिया, और इस गम में उसने खुद को दुनिया से काट लिया। उसने आशा से शादी तो की, पर अपना मन पायल की यादों की बेड़ियों में बांध लिया। उसे लगता था कि अगर वह आशा से प्यार करेगा, तो यह पायल के साथ नाइंसाफी होगी।
कहानी में मोड़ तब आया जब एक शाम संजय को दफ्तर से लौटते वक्त एक अज्ञात कॉल आया। फोन करने वाले ने कहा, “संजय, पायल मुसीबत में है, उसे तुम्हारी मदद चाहिए।” संजय का पुराना घाव हरा हो गया। वह बिना सोचे-समझे तेज़ बारिश में कार लेकर निकल पड़ा। रास्ते में तेज़ रफ्तार और भावनाओं के सैलाब के कारण संजय की कार का भयानक एक्सीडेंट हो गया।
जब आशा को खबर मिली, तो वह बदहवास अस्पताल पहुँची। संजय की हालत नाज़ुक थी। उसे तुरंत सर्जरी की ज़रूरत थी। डॉक्टर ने कहा, “मिसेज आशा, इनके बचने की उम्मीद कम है, क्योंकि इन्होंने जीने की इच्छा ही छोड़ दी है।”
वो रात: जब सब्र की जीत हुई
आशा पूरी रात संजय के बिस्तर के पास बैठी रही। वह उसका हाथ थामे रोती रही और अपनी तीन साल की पूरी खामोश तपस्या उस एक रात में कह डाली। उसने संजय के कान में फुसफुसाते हुए कहा— “संजय, आप उस साये के लिए मर रहे हैं जो कब का जा चुका है, पर जो हकीकत आपके लिए तीन साल से जाग रही है, क्या उसकी कोई कीमत नहीं?”
तभी अचानक एक नर्स ने आकर आशा को एक लेटर दिया, जो अस्पताल के बाहर कोई महिला छोड़ गई थी। वह पायल थी। उसने लिखा था, “संजय, मैं यहाँ सिर्फ ये बताने आई थी कि मैं खुश हूँ और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ चुकी हूँ। तुम जिसे प्यार समझ रहे हो, वो सिर्फ तुम्हारी ज़िद है। तुम्हारी असली खुशी तुम्हारी पत्नी आशा है, जिसने मेरी गैरमौजूदगी में भी तुम्हारा घर संभाला। उसे अब और मत तड़पाओ।”
मिलन और प्रायश्चित
अगली सुबह जब संजय को होश आया, तो उसकी पहली नज़र आशा पर पड़ी। इस बार उसकी नज़रों में वो पुराना खालीपन नहीं था। उसने कांपते हाथों से आशा का हाथ पकड़ा और अपनी सूखी आवाज़ में पहली बार कहा— “आशा… मुझे माफ कर दो। मैं एक अंधेरे कमरे में बंद था, और तुमने बाहर दीप जलाए रखा।”
आशा के सब्र का बांध टूट गया। दोनों फूट-फूट कर रोए। संजय को अहसास हुआ कि उसने तीन साल तक एक बेशकीमती इंसान को सिर्फ एक पुराने ज़ख्म की खातिर नज़रअंदाज़ किया। उसने आशा से वादा किया कि अब वह उसे कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने देगा।
नैनीताल की वह ठंडी हवा अब मुंबई के उस घर में महकने लगी थी। संजय ने पायल की यादों को हमेशा के लिए दफन कर दिया और आशा के साथ एक नई दास्ताँ लिखने की शुरुआत की—एक ऐसी दास्ताँ जिसे आने वाली नस्लें ‘सच्ची मोहब्बत और धैर्य’ का नाम देंगी।
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