“इस दुनिया में सब कुछ वैसा नहीं होता जैसा दिखता है…
कुछ साए ऐसे होते हैं जो अंधेरे में नहीं, हमारे बिल्कुल पास चलते हैं…
अरुणावती…
एक सीधी-सादी, समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी।
उसका जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ था, जहाँ रात होते ही पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता था…
पर उसकी आँखों में सपनों की रोशनी कभी कम नहीं हुई।
उसके माता-पिता गरीब किसान थे।
दिनभर खेतों में मेहनत… और बदले में बस दो वक्त की रोटी।
लेकिन अरुणावती पढ़ना चाहती थी… कुछ बनना चाहती थी।
गाँव के टूटे-फूटे कॉलेज से उसने ग्रेजुएशन पूरा किया।
लोग हँसते थे —
“लड़की है… आखिर में शादी ही तो करनी है।”
जब शादी की बात चली, तो उसके माता-पिता की आँखें झुक गईं।
दहेज देने के लिए पैसे नहीं थे…
समाज की बातें तीर की तरह चुभ रही थीं।
तब अरुणावती ने एक दिन दृढ़ आवाज़ में कहा —
“मैं बोझ नहीं बनूँगी। मैं खुद अपनी किस्मत लिखूँगी।”
और फिर…
वो गाँव छोड़कर मुंबई आ गई।
🌆 सपनों का शहर… या कुछ और?
मुंबई में उसे एक बड़े होटल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई।
दिनभर मुस्कुराना…
लोगों से मीठी बातें करना…
और रात में एक छोटे से किराए के कमरे में लौट आना।
सब कुछ ठीक चल रहा था…
जब तक कि वो रात नहीं आई।
🌑 वो सुनसान सड़क…
उस दिन होटल में काम ज़्यादा था।
रात के 11 बज चुके थे।
ऑटो नहीं मिला।
सड़क लगभग खाली थी।
हवा अजीब सी ठंडी थी… जबकि मौसम ठंड का नहीं था।
अरुणावती ने सोचा —
“बस पाँच मिनट की तो बात है… चलकर चली जाती हूँ।”
लेकिन जैसे ही वो उस पुराने, सुनसान गली के पास पहुँची…
अचानक…
हवा रुक गई।
पेड़ों की टहनियाँ बिना हवा के हिलने लगीं।
और तभी…
किसी ने बहुत धीमी, लेकिन साफ़ आवाज़ में उसका नाम पुकारा —
“अरुणावती…”
वो ठिठक गई।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा…
और वहाँ…
एक औरत खड़ी थी।
👁️ वो औरत…
काली साड़ी में लिपटी।
बाल पूरी तरह बिखरे हुए।
चेहरा आधा अंधेरे में… आधा दिखाई दे रहा था।
लेकिन सबसे डरावनी बात…
उसकी आँखें लाल थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे उनमें आग जल रही हो।
और उसके पैर…
उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।
अरुणावती के गले से आवाज़ नहीं निकली।
उसका शरीर जैसे पत्थर बन गया था।
वो औरत धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी…
उसके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी…
पर ज़मीन पर खरोंच जैसी ध्वनि सुनाई दे रही थी।
🏃♀️ भागो… जितना भाग सकती हो
अचानक अरुणावती के अंदर जैसे जान वापस आई।
वो मुड़ी… और पूरी ताकत से दौड़ पड़ी।
उसके मुँह से अपने आप निकला —
“जय श्री हनुमान… जय श्री हनुमान…!”
वो लगातार बजरंग बली का नाम ले रही थी।
पीछे से हँसी की एक भयानक आवाज़ गूँज रही थी।
दौड़ते-दौड़ते अचानक उसका पैर फिसला —
और वो ज़मीन पर गिर पड़ी।
उसके घुटनों से खून निकल आया।
जब उसने पीछे मुड़कर देखा…
वो चुड़ैल अब सिर्फ दो कदम दूर थी।
उसकी साँसें बर्फ जैसी ठंडी थीं।
उसका चेहरा अरुणावती के बिल्कुल पास आ गया।
वो मुस्कुरा रही थी…
🕯️ और तभी…
अचानक…
चारों तरफ एक तेज़ प्रकाश फैल गया।
इतना तेज़ कि जैसे किसी ने रात को जला दिया हो।
चुड़ैल चीखी…
उसकी आवाज़ कान फाड़ देने वाली थी।
उस प्रकाश में से एक वृद्ध व्यक्ति प्रकट हुए।
सफेद वस्त्र…
माथे पर तिलक…
आँखों में अजीब सी दिव्य चमक।
उन्होंने शांत स्वर में कहा —
“डर मत बेटी… अब तुझे कोई छू नहीं सकता।”
जैसे ही उन्होंने अपना हाथ उठाया…
वो चुड़ैल हवा में धुएँ की तरह गायब हो गई।
🏠 घर… और एक एहसास
वृद्ध ने अरुणावती को उठाया।
वो उसे उसके घर तक छोड़ने आए।
पूरे रास्ते उन्होंने कुछ नहीं कहा।
जब अरुणावती अपने दरवाज़े तक पहुँची…
उसने मुड़कर धन्यवाद कहना चाहा…
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सड़क खाली थी।
जैसे कोई कभी आया ही नहीं।
🙏 अगली सुबह…
डर के कारण उसे रातभर नींद नहीं आई।
सुबह होते ही वो सीधे हनुमान जी के मंदिर पहुँची।
उसकी आँखों में आँसू थे।
वो समझ चुकी थी —
उसे बचाने वाला कोई साधारण इंसान नहीं था।
उस दिन के बाद…
वो कभी उस सड़क से नहीं गुज़री।
लेकिन एक अजीब बात है…
कुछ महीनों बाद उस इलाके में रहने वाले लोगों ने बताया —
उसी गली में सालों पहले एक औरत की हत्या हुई थी…
जिसकी आत्मा अब भी भटकती है।
और आज भी…
रात के 11 बजे के बाद
कभी-कभी किसी लड़की का नाम पुकारती आवाज़ सुनाई देती है…
आज भी जब कोई डर अरुणावती के सामने आता है…
वो सिर्फ एक नाम लेती है —
“जय श्री हनुमान!”
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