भूमिका
हर घर कुछ न कुछ छुपाता है…
कोई यादें… कोई किस्से… और कभी-कभी… वो भी… जो मरने के बाद भी मरा नहीं होता।
यह कहानी है एक ऐसे दरवाज़े की…
जो कभी खुला नहीं था… और जब खुला… तो सब कुछ बदल गया।
मुख्य पात्र
- कविता – 28 साल की नवविवाहित महिला
- राहुल – उसका पति, एक आर्किटेक्ट
- लोकेशन – शिमला की पहाड़ियों में बना 150 साल पुराना विला, जिसे उन्होंने हनीमून होम के रूप में किराए पर लिया
भाग 1: पुराना बंगला
कविता और राहुल, शिमला के एक घने जंगल के किनारे बने पुराने विला में आए थे। चारों ओर कोहरा था। दूर-दूर तक कोई नहीं… बस एक नौकर — मोहन, जो सालों से उस विला की देखभाल कर रहा था।
राहुल को घर बहुत पसंद आया — लकड़ी की सीढ़ियाँ, पुरानी घड़ियाँ, बड़े झूमर…
लेकिन कविता को पहली नज़र में ही अजीब-सी घुटन महसूस हुई।
वह बार-बार कहती,
“ये घर साँस लेता है राहुल… और देखता भी है।”
राहुल हँस देता,
“पुराना है… शायद हवा की आवाज़ें होंगी।”
लेकिन कविता को यकीन था — कुछ है… जो सिर्फ उसे महसूस हो रहा है।
भाग 2: 13वां दरवाज़ा
तीसरे दिन कविता ने घर में घूमते हुए कुछ अजीब नोटिस किया।
सीढ़ियों के पीछे एक लंबा गलियारा था। उसमें 12 दरवाज़े थे।
वह गिनती करती हुई आगे बढ़ी — 1… 2… 3… और 12…
लेकिन दीवार पर एक निशान था — जैसे कभी वहाँ भी एक दरवाज़ा था।
13वाँ दरवाज़ा।
वह चौंक गई।
जब उसने मोहन से पूछा, तो वह घबरा गया।
मोहन बोला,
“उस दरवाज़े को कभी मत ढूंढना बीबीजी… वो खुला… तो बंद कभी नहीं होगा।”
उस रात कविता ने सपना देखा —
13वाँ दरवाज़ा खुल रहा है… अंदर सिर्फ अंधेरा है… और कोई उसे बुला रहा है।
एक फुसफुसाहट…
“कविता… अंदर आओ… वो सब दिखाऊँगा जो तुमने कभी नहीं देखा…”
भाग 3: घर का अतीत
कविता ने पुराने अखबारों और फाइलों से घर का इतिहास खंगाला।
वह जानकर सन्न रह गई — इस विला के पिछले मालिक की पत्नी ने इसी 13वें कमरे में आत्महत्या की थी। उसके बाद से घर में अजीब घटनाएँ होने लगी थीं।
सबसे डरावनी बात तब हुई…
जब उसने उस महिला की तस्वीर देखी।
वह महिला हूबहू कविता जैसी दिखती थी।
भाग 4: दरवाज़ा खुलता है
एक रात अचानक घर की बिजली चली गई।
कविता मोमबत्ती लेकर गलियारे में निकली… और देखा —
13वाँ दरवाज़ा वापस आ गया था।
वह थोड़ा खुला हुआ था।
जैसे किसी ने उसे अंदर आने का न्योता दिया हो।
कविता जैसे सम्मोहित होकर आगे बढ़ी।
दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
अंदर एक काली सुरंग जैसी जगह थी।
दीवारों पर खून के निशान… ज़मीन पर खरोंच के चिन्ह…
तभी एक महिला की चीख गूँजी —
“बाहर मत जाना कविता… अब तुम भी मेरी तरह बन जाओगी!”
कविता घबराकर पीछे मुड़ी…
लेकिन राहुल कहीं दिखाई नहीं दिया।
भाग 5: दूसरा संसार
अब हर दिन उस दरवाज़े से अजीब आवाज़ें आने लगीं।
कभी रोने की आवाज़…
कभी हँसी…
कभी फुसफुसाहट…
धीरे-धीरे कविता की नींद उड़ गई।
आँखों के नीचे काले घेरे… डर हर समय उसके साथ रहने लगा।
एक रात…
दरवाज़ा फिर से खुला।
राहुल ने देखा — कविता उसमें समा गई…
और अचानक गायब हो गई।
भाग 6: कहानी का अंत… या नया आरंभ?
राहुल ने पुलिस को बुलाया।
पूरे घर की तलाशी ली गई।
लेकिन कविता का कोई नामोनिशान नहीं मिला।
13वाँ दरवाज़ा फिर से दीवार बन चुका था — जैसे कभी था ही नहीं।
मोहन ने धीमी आवाज़ में कहा,
“जो दरवाज़ा चुने… वो बाहर नहीं आता साहब…”
6 महीने बाद…
एक नया जोड़ा उस विला में आया।
और पहली ही रात…
पत्नी ने सपना देखा —
“कविता… अंदर आओ…”
अंतिम पंक्तियाँ
कुछ दरवाज़े घर का हिस्सा नहीं होते…
वो किसी और दुनिया का रास्ता होते हैं।
अगर कभी तुम्हें 13वाँ दरवाज़ा दिखे…
तो भाग जाना…
क्योंकि वहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
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