अमावस्या की रात, वो पुरानी लूना और खौफनाक टेलीग्राम “50 साल पुराना सच” Horror Stories of Ghost

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आज जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो कोई काल्पनिक किस्सा नहीं है। यह मेरे अपने परिवार की एक ऐसी सच्चाई है जिसे याद करके आज भी मेरे पापा के माथे पर पसीना आ जाता है। यह बात आज से करीब 50 साल पुरानी है, जब दुनिया आज जितनी शोर-शराबे वाली नहीं थी। उस दौर में न मोबाइल थे, न इंटरनेट। अपनों तक खबर पहुँचाने का सिर्फ एक ही जरिया था— टेलीग्रामHorror Stories of Ghost

मेरे पापा उन दिनों एक छोटे से गाँव में रहते थे। एक रात अचानक मेरी दादी की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। घर में अफरा-तफरी मच गई, क्योंकि गाँव के हकीम ने साफ़ कह दिया था कि हालत गंभीर है और शहर में रहने वाले बड़े भाई को तुरंत बुलाना होगा। उस ज़माने में रात के वक्त शहर जाना किसी चुनौती से कम नहीं था। रास्ते कच्चे थे, बिजली का नामोनिशान नहीं था और चारों तरफ घना जंगल और झाड़ियाँ थीं।

पापा के पास उनकी अपनी एक लूना थी। उन्होंने हिम्मत जुटाई और अपने सबसे करीबी दोस्त रमेश अंकल को साथ लिया। रात के करीब 9 बज रहे थे जब उन्होंने लूना स्टार्ट की। पट-पट-पट-पट की आवाज़ के साथ वो दोनों सुनसान रास्तों पर निकल पड़े। रास्ते में सन्नाटा इतना गहरा था कि लूना की आवाज़ भी किसी धमाके जैसी लग रही थी। गीदड़ों के रोने की आवाज़ें आ रही थीं, जो गाँव में अक्सर किसी अनहोनी का संकेत मानी जाती थीं।

जैसे-तैसे वो शहर पहुँचे, पोस्ट ऑफिस का दरवाज़ा खटखटाया और घबराहट में एक टेलीग्राम भेजा— माँ की हालत खराब है, तुरंत पहुँचो।” काम खत्म हुआ तो पापा के मन का बोझ थोड़ा कम हुआ, लेकिन जब उन्होंने घड़ी देखी तो रात के 11:30 बज चुके थे। रमेश अंकल ने कहा कि रात शहर में ही काट लेते हैं, सुबह निकलेंगे। पर पापा का मन घर पर अटका था, उन्हें दादी की फिक्र थी। उन्होंने कहा— “नहीं यार, अपनी लूना है न, धीरे-धीरे निकल चलेंगे।” उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि ये फैसला उन्हें मौत के कितने करीब ले जाएगा।

वापसी का सफर शुरू हुआ। शहर की रोशनी पीछे छूट गई और फिर से वही घना अंधेरा सामने आ गया। करीब आधे रास्ते में एक पुरानी नहर का पुल पड़ता था। गाँव के लोग उस पुल के पास से गुज़रने में कतराते थे। कहते थे कि वहाँ एक भटकती हुई रूह का बसेरा है। पापा हमेशा इन बातों को अंधविश्वास मानते थे, लेकिन उस रात कुछ अलग था। उस रात अमावस्या थी।

जैसे ही लूना के पहिए उस पुल की ढलान पर चढ़े, अचानक गाड़ी का इंजन भारी होने लगा। पापा ने पूरा एक्सीलेटर खींच दिया, पर लूना की रफ्तार बढ़ने के बजाय कम होने लगी। तभी हवा का एक ऐसा बर्फीला झोंका आया जिसने उनकी हड्डियों तक को कँपा दिया। अचानक पीछे बैठे रमेश अंकल ने पापा के कंधे को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि पापा की चीख निकल गई। रमेश अंकल की आवाज़ नहीं निकल रही थी, वो बस कांपते हुए इशारे से कह रहे थे— पीछे… पीछे मत देखना… बस भाग!”

पापा ने अनजाने में साइड मिरर में नज़र डाली और जो देखा, उसे देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया। पुल की रेलिंग पर एक औरत खड़ी थी। सफेद साड़ी, उलझे हुए लंबे बाल और एक चेहरा जो पूरी तरह से ठंडा और बेजान था। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थी। पापा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उन्हें अपनी माँ की बचपन की एक बात याद आई— “अगर कभी ऐसी काली शक्ति का अहसास हो, तो पीछे मुड़कर मत देखना और गाड़ी मत रोकना।”

पापा ने अपनी आँखें सामने सड़क पर जमा लीं। लूना अपनी पूरी ताकत से भाग रही थी, लेकिन वो औरत… वो ज़मीन को छुए बिना उनके ठीक बगल में दौड़ रही थी। पीछे से उसके पैरों की छप-छप की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई गीले पैरों से पीछा कर रहा हो। वो रूह बार-बार फुसफुसा रही थी— अकेले कहाँ जा रहे हो? मुझे भी ले चलो…” हवा इतनी ठंडी हो गई थी कि पापा के हाथ हैंडल पर जम गए थे। करीब 3 किलोमीटर तक वो साया मौत बनकर उनके पीछे लगा रहा।

पापा ज़ोर-ज़ोर से हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। उनकी उंगलियाँ नीली पड़ चुकी थीं, पर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जैसे ही दूर से गाँव की पहली चौपाल की रोशनी दिखी, वो आवाज़ और वो ठंडी हवा अचानक गायब हो गई। जैसे वहाँ कुछ था ही नहीं। जब दोनों घर पहुँचे, तो दोनों का शरीर पसीने से भीगा हुआ था, जबकि बाहर कड़ाके की ठंड थी।

अगली सुबह जब गाँव के बुजुर्गों को यह बात पता चली, तो सन्नाटा छा गया। एक बुजुर्ग ने धीमी आवाज़ में कहा— तुम बहुत खुशनसीब हो बेटा। कल अमावस्या थी और उस पुल वाली रूह को अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई चाहिए था। अगर तुम एक सेकंड के लिए भी रुक जाते या पीछे मुड़कर उसकी आँखों में देख लेते, तो आज तुम्हारी लूना तो मिलती, पर तुम नहीं।”

आज भी जब पापा उस रास्ते से गुज़रते हैं, तो उनकी नज़रें सड़क से नहीं हटतीं। क्योंकि कुछ रास्ते सिर्फ सड़क नहीं होते, वो उन रूहों का ठिकाना होते हैं जो आज भी किसी का इंतज़ार कर रही हैं।

तो दोस्तों, यह थी आज की कहानी। अगर आपके पास भी कोई ऐसी सच्ची घटना है, तो मुझे कमेंट में ज़रूर बताएँ। मैं था आपके साथ यश। सावधान रहें, क्योंकि रात के अंधेरे में अक्सर हम अकेले नहीं होते। हमारा YOUTUBE CHANNEL ‘Horror Stories of Ghost’ को सब्सक्राइब करना न भूलें। शुक्रिया!

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